Saturday, October 9, 2010

मेरा प्रिय पति

लेखिका : नेहा वर्मा

मेरी शादी हुए करीब दस साल हो गये थे। इन दस सालों में मैं अपने पति से ही तन का सुख प्राप्त करती थी। उन्हें अब डायबिटीज हो गई थी और काफ़ी बढ़ भी गई थी। इसी कारण से उन्हें एक बार हृदयघात भी हो चुका था। अब तो उनकी यह हालत हो गई थी कि उनके लण्ड की कसावट भी ढीली होने लगी थी। लण्ड का कड़कपन भी नहीं रहा था। उनका शिश्न में बहुत शिथिलता आ गई थी। वैसे भी जब वो मुझे चोदने की कोशिश करते थे तो उनकी सांस फ़ूल जाती थी, और धड़कन बढ़ जाती थी। अब धीरे धीरे रणवीर से मेरा शारीरिक सम्बन्ध भी समाप्त होने लगा था। पर अभी मैं तो अपनी भरपूर जवानी पर थी, 35 साल की हो रही थी।

जब से मुझे यह महसूस होने लगा कि मेरे पति मुझे चोदने के लायक नहीं रहे तो मुझ पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव होने लगा। मेरी चुदाई की इच्छा बढ़ने लगी थी। रातों को मैं वासना से तड़पने लगी थी। रणवीर को यह पता था पर मजबूर था। मैं उनका लण्ड पकड़ कर खूब हिलाती थी और ढीले लण्ड पर मुठ भी मारती थी, पर उससे तो उनका वीर्य स्खलित हो जाया करता था पर मैं तो प्यासी रह जाती थी।

मैं मन ही मन में बहुत उदास हो जाती थी। मुझे तो एक मजबूत, कठोर लौड़ा चाहिये था ! जो मेरी चूत को जम के चोद सके। अब मेरा मन मेरे बस में नहीं था और मेरी निगाहें रणवीर के दोस्तों पर उठने लगी थी। एक दोस्त तो रणवीर का खास था, वो अक्सर शाम को आ जाया करता था।

मेरा पहला निशाना वही बना। उसके साथ अब मैं चुदाई की कल्पना करने लगी थी। मेरा दिल उससे चुदाने के लिये तड़प जाता था। मैं उसके सम्मुख वही सब घिसी-पिटी तरकीबें आजमाने लगी। मैं उसके सामने जाती तो अपने स्तनो को झुका कर उसे दर्शाती थी। उसे बार बार देख कर मतलबी निगाहों से उसे उकसाती थी। यही तरकीबें अब भी करगार साबित हो रही थी। मुझे मालूम हो चुका था था कि वो मेरी गिरफ़्त में आ चुका है, बस उसकी शरम तोड़ने की जरूरत थी। मेरी ये हरकतें रणवीर से नहीं छुप सकी। उसने भांप लिया था कि मुझे लण्ड की आवश्यकता है।

अपनी मजबूरी पर वो उदास सा हो जाता था। पर उसने मेरे बारे में सोच कर शायद कुछ निर्णय ले लिया था। वो सोच में पड़ गया ...

"कोमल, तुम्हें भोपाल जाना था ना... कैसे जाओगी ?"

"अरे, वो है ना तुम्हारा दोस्त, राजा, उसके साथ चली जाऊंगी !"

"तुम्हें पसन्द है ना वो..." उसने मेरी ओर सूनी आंखो से देखा।

मेरी आंखे डर के मारे फ़टी रह गई। पर रणवीर के आंखो में प्यार था।

"नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है ... बस मुझे उस पर विश्वास है।"

"मुझे माफ़ कर देना, कोमल... मैं तुम्हें सन्तुष्ट नहीं कर पाता हूं, बुरा ना मानो तो एक बात कहूं?"

"जी... ऐसी कोई बात नहीं है ... यह तो मेरी किस्मत की बात है..."

"मैं जानता हूं, राजा तुम्हें अच्छा लगता है, उसकी आंखें भी मैंने पहचान ली है..."

"तो क्या ?..." मेरा दिल धड़क उठा ।

"तुम भोपाल में दो तीन दिन उसके साथ किसी होटल में रुक जाना ... तुम्हें मैं और नहीं बांधना चाहता हूं, मैं अपनी कमजोरी जानता हूँ।"

"जानू ... ये क्या कह रहे हो ? मैं जिन्दगी भर ऐसे ही रह लूंगी।" मैंने रणवीर को अपने गले लगा लिया, उसे बहुत चूमा... उसने मेरी हालत पहचान ली थी। उसका कहना था कि मेरी जानकारी में तुम सब कुछ करो ताकि समय आने पर वो मुझे किसी भी परेशानी से निकाल सके। राजा को भोपाल जाने के लिये मैंने राजी कर लिया।

पर रणवीर की हालत पर मेरा दिल रोने लगा था। शाम की डीलक्स बस में हम दोनों को रणवीर छोड़ने आया था। राजा को देखते ही मैं सब कुछ भूल गई थी। बस आने वाले पलों का इन्तज़ार कर रही थी। मैं बहुत खुश थी कि उसने मुझे चुदाने की छूट दे दी थी। बस अब राजा को रास्ते में पटाना था। पांच बजे बस रवाना हो गई। रणवीर सूनी आंखों से मुझे देखता रहा। एक बार तो मुझे फिर से रूलाई आ गई... उसका दिल कितना बड़ा था ... उसे मेरा कितना ख्याल था... पर मैंने अपनी भावनाओं पर जल्दी ही काबू पा लिया था।

हमारा हंसी मजाक सफ़र में जल्दी ही शुरू हो गया था। रास्ते में मैंने कई बार उसका हाथ दबाया था, पर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। पर कब तक वो अपने आप को रोक पाता... आखिर उसने मेरा हाथ भी दबा ही दिया। मैं खुश हो गई...

रास्ता खुल रहा था। मैंने टाईट सलवार कुर्ता पहन रखा था। अन्दर पैंटी नहीं पहनी थी, ब्रा भी नहीं पहनी थी। यह मेरा पहले से ही सोचा हुआ कार्यक्रम था । वो मेरे हाथों को दबाने लगा। उसका लण्ड भी पैंट में उभर कर अपनी उपस्थिति दर्शा रहा था। उसके लण्ड के कड़कपन को देख कर मैं बहुत खुश हो रही थी कि अब इसे लण्ड से मस्ती से चुदाई करूंगी। मैं किसी भी हालत में राजा को नहीं छोड़ने वाली थी।

"कोमल ... क्या मैं तुम्हें अच्छा लगता हूं...?"

"हूं ... अच्छे लोग अच्छे ही लगते हैं..." मैंने जान कर अपना चहरा उसके चेहरे के पास कर लिया। राजा की तेज निगाहें दूसरे लोगों को परख रही थी, कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा है। उसने धीरे से मेरे गाल को चूम लिया। मैं मुस्करा उठी ... मैंने अपना एक हाथ उसकी जांघो पर रख दिया और हौले हौले से दबाने लगी। मुझे जल्दी शुरूआत करनी थी, ताकि उसे मैं भोपाल से पहले अपनी अदाओं से घायल कर सकूं।

यही हुआ भी ...... सीटे ऊंची थी अतः वो भी मेरे गले में हाथ डाल कर अपना हाथ मेरी चूचियों तक पहुँचाने की कोशिश करने लगा। पर हाय राम ! बस एक बार उसने कठोर चूचियों को दबाया और जल्दी से हाथ हटा लिया। मैं तड़प कर रह गई। बदले में मैंने भी उसका उभरा लण्ड दबा दिया और सीधे हो कर बैठ गई। पर मेरा दिल खुशी से बल्लियों उछल रहा था। राजा मेरे कब्जे में आ चुका था। अंधेरा बढ़ चुका था... तभी बस एक मिड-वे पर रुकी।

राजा दोनों के लिये शीतल पेय ले आया। कुछ ही देर में बस चल पड़ी। दो घण्टे पश्चात ही भोपाल आने वाला था। मेरा दिल शीतल पेय में नहीं था बस राजा की ओर ही था। मैं एक हाथ से पेय पी रही थी, पर मेरा दूसरा हाथ ... जी हां उसकी पैंट में कुछ तलाशने लगा था ... गड़बड़ करने में मगशूल था। उसका भी एक हाथ मेरी चिकनी जांघों पर फ़िसल रहा था। मेरे शरीर में तरावट आने लगी थी। एक लम्बे समय के बाद किसी मर्द के साथ सम्पर्क होने जा रहा था। एक सोलिड तना हुआ लण्ड चूत में घुसने वाला था। यह सोच कर ही मैं तो नशे में खो गई थी।

तभी उसकी अंगुली का स्पर्श मेरे दाने पर हुआ। मैं सिह उठी। मैंने जल्दी से इधर उधर देखा और किसी को ना देखता पा कर मैंने चैन की सांस ली। मैंने अपनी चुन्नी उसके हाथ पर डाल दी। अंधेरे का फ़ायदा उठा कर उसने मेरी चूचियाँ भी सहला दी थी। मैं अब स्वतन्त्र हो कर उसके लण्ड को सहला कर उसकी मोटाई और लम्बाई का जायजा ले रही थी।

मैं बार बार अपना मुख उसके होंठों के समीप लाने का प्रयत्न कर रही थी। उसने भी मेरी तरफ़ देखा और मेरे पर झुक गया। उसके गीले होंठ मेरे होंठों के कब्जे में आ गये थे। मौका देख कर मैंने पैंट की ज़िप खोल ली और हाथ अन्दर घुसा दिया। उसका लण्ड अण्डरवियर के अन्दर था, पर ठीक से पकड़ में आ गया था।

वो थोड़ा सा विचलित हुआ पर जरा भी विरोध नहीं किया। मैंने उसकी अण्डरवियर को हटा कर नंगा लण्ड पकड़ लिया। मैंने जोश में उसके होंठों को जोर से चूस लिया और मेरे मुख से चूसने की जोर से आवाज आई। राजा एक दम से दूर हो गया। पर बस की आवाज में वो किसी को सुनाई नहीं दी। मैं वासना में निढाल हो चुकी थी। मन कर रहा था कि वो मेरे अंगों को मसल डाले। अपना लण्ड मेरी चूत में घुसा डाले ... पर बस में तो यह सब सम्भव नहीं था। मैं धीरे धीरे झुक कर उसकी जांघों पर अपना सर रख लिया। उसकी जिप खुली हुई थी, लण्ड में से एक भीनी भीनी से वीर्य जैसी सुगन्ध आ रही थी। मेरे मुख से लण्ड बहुत निकट था, मेरा मन उसे अपने मुख में लेने को मचल उठा। मैंने उसका लण्ड पैंट में से खींच कर बाहर निकाल लिया और अपने मुख से हवाले कर लिया। राजा ने मेरी चुन्नी मेरे ऊपर डाल दी। उसके लण्ड के बस दो चार सुटके ही लिये थे कि बस की लाईटें जल उठी थी। भोपाल आ चुका था। मैंने जैसे सोने से उठने का बहाना बनाया और अंगड़ाई लेने लगी। मुझे आश्चर्य हुआ कि सफ़र तो बस पल भर का ही था ! इतनी जल्दी कैसे आ गया भोपाल ? रात के नौ बज चुके थे।

रास्ते में बस स्टैण्ड आने के पहले ही हम दोनों उतर गये। राजा मुझे कह रहा था कि घर यहाँ से पास ही है, टैक्सी ले लेते हैं। मैं यह सुन कर तड़प गई- साला चुदाई की बात तो करता नहीं है, घर भेजने की बात करता है।

मैंने राजा को सुझाव दिया कि घर तो सवेरे चलेंगे, अभी तो किसी होटल में भोजन कर लेते हैं, और कहीं रुक जायेंगे। इस समय घर में सभी को तकलीफ़ होगी। उन्हें खाना बनाना पड़ेगा, ठहराने की कवायद शुरू हो जायेगी, वगैरह।

उसे बात समझ में आ गई। राजा को मैंने होटल का पता बताया और वहाँ चले आये।

"तुम्हारे घर वाले क्या सोचेंगे भला..."

"तुम्हें क्या ... मैं कोई भी बहाना बना दूंगी।"

कमरे में आते ही रणवीर का फोन आ गया और पूछने लगा। मैंने उसे बता दिया कि रास्ते में तो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई, और हम दोनों होटल में रुक गये हैं।

"किसका फोन था... रणवीर का ...?"

"हां, मैंने बता दिया है कि हम एक होटल में अलग अलग कमरे में रुक गये हैं।"

"तो ठीक है ..." राजा ने अपने कपड़े उतार कर तौलिया लपेट लिया था, मैंने भी अपने कपड़े उतारे और ऊपर तौलिया डाल लिया।

"मैं नहाने जा रही हूँ ..."

"ठीक है मैं बाद में नहा लूंगा।"

मुझे बहुत गुस्सा आया ... यूं तो हुआ नहीं कि मेरा तौलिया खींच कर मुझे नंगी कर दे और बाथ रूम में घुस कर मुझे खूब दबाये ... छीः ... ये तो लल्लू है। मैं मन मार कर बाथ रूम में घुस गई और तौलिया एक तरफ़ लटका दिया। अब मैं नंगी थी।

मैंने झरना खोल दिया और ठण्डी ठण्डी फ़ुहारों का आनन्द लेने लगी।

"कोमल जी, क्या मैं भी आ जाऊं नहाने...?"

मैं फिर से खीज उठी... कैसा है ये आदमी ... साला एक नंगी स्त्री को देख कर भी हिचकिचा रहा है। मैंने उसे हंस कर तिरछी निगाहों से देखा। वो नंगा था ...

उसका लण्ड तन्नाया हुआ था। मेरी हंसी फ़ूट पड़ी।

"तो क्या ऐसे ही खड़े रहोगे ... वो भी ऐसी हालत में ... देखो तो जरा..."

मैंने अपना हाथ बढ़ाकर उसका हाथ थाम लिया और अपनी ओर खींच लिया। उसने एक गहरी सांस ली और उसने मेरी पीठ पर अपना शरीर चिपका लिया। उसका खड़ा लण्ड मेरे चूतड़ों पर फ़िसलने लगा। मेरी सांसें तेज हो गई। मेरे गीले बदन पर उसके हाथ फ़िसलने लगे। मेरी भीगी हुई चूचियाँ उसने दबा डाली। मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा था। हम दोनों झरने की बौछार में भीगने लगे। उसका लण्ड मेरी चूतड़ों की दरार को चीर कर छेद तक पहुंच गया था। मैं अपने आप झुक कर उसके लण्ड को रास्ता देने लगी। लण्ड का दबाव छेद पर बढ़ता गया और हाय रे ! एक फ़क की आवाज के साथ अन्दर प्रवेश कर गया। उसका लण्ड जैसे मेरी गाण्ड में नहीं बल्कि जैसे मेरे दिल में उतर गया था। मैं आनन्द के मारे तड़प उठी।

आखिर मेरी दिल की इच्छा पूरी हुई। एक आनन्द भरी चीख मुख से निकल गई।

उसने लण्ड को फिर से बाहर निकाला और जोर से फिर ठूंस दिया। मेरे भीगे हुये बदन में आग भर गई। उसके हाथों ने मेरे उभारों को जोर जोर से हिलाना और मसलना आरम्भ कर दिया था। उसका हाथ आगे से बढ़ कर चूत तक आ गया था और उसकी दो अंगुलियां मेरी चूत में उतर गई थी। मैंने अपनी दोनों टांगें फ़ैला ली थी।

उसके शॉट तेज होने लगे थे। अतिवासना से भरी मैं बेचारी जल्दी ही झड़ गई।

उसका वीर्य भी मेरी टाईट गाण्ड में घुसने के कारण जल्दी निकल गया था।

हम स्नान करके बाहर आ गये थे। पति पत्नी की तरह हमने एक दूसरे को प्यार किया और रात्रि भोजन हेतु नीचे प्रस्थान कर गये।

तभी रणवीर का फोन आया," कैसी हो। बात बनी या नहीं...?"

"नहीं जानू, वो तो सो गया है, मैं भी खाना खाकर सोने जा रही हूँ !"

"तुम तो बुद्धू हो, पटे पटाये को नहीं पटा सकती हो...?"

"अरे वो तो मुझे भाभी ही कहता रहा ... लिफ़्ट ही नहीं मार रहा है, आखिर तुम्हारा सच्चा दोस्त जो ठहरा !"

"धत्त, एक बार और कोशिश करना अभी ... देखो चुद कर ही आना ...।"

"अरे हां मेरे जानू, कोशिश तो कर रही हूँ ना ... गुडनाईट"

मैं मर्दों की फ़ितरत पहचानती थी, सो मैंने चुदाई की बात को गुप्त रखना ही बेहतर समझा। राजा मेरी बातों को समझने की कोशिश कर रहा था। हम दोनों खाना खाकर सोने के लिये कमरे में आ गये थे। मेरी तो यह यात्रा हनीमून जैसी थी, महीनों बाद मैं चुदने वाली थी। गाण्ड तो चुदा ही चुकी थी। मैंने तुरंत हल्के कपड़े पहने और बिस्तर पर कूद गई और टांगें पसार कर लेट गई।

"आओ ना ... लेट जाओ ..." उसका हाथ खींच कर मैंने उसे भी अपने पास लेटा दिया।

"राजा, घर पर तुमने खूब तड़पाया है ... बड़े शरीफ़ बन कर आते थे !"

"आपने तो भी बहुत शराफ़त दिखाई... भैया भैया कह कर मेरे लण्ड को ही झुका देती थी !"

"तो और क्या कहती, सैंया... सैंया कहती ... बाहर तो भैया ही ठीक रहता है।"

मैं उसके ऊपर चढ़ गई और उसकी जांघों पर आ गई।

"यह देख, साला अब कैसा कड़क रहा है ... निकालूँ मैं भी क्या अपनी फ़ुद्दी..." मैंने आंख मारी।

"ऐ हट बेशरम ... ऐसा मत बोल..." राजा मेरी बातों से झेंप गया।

"अरे जा रे ... मेरी प्यारी सी चूत देख कर तेरा लण्ड देख तो कैसा जोर मार रहा है।"

"तेरी भाषा सुन कर मेरा लण्ड तो और फ़ूल गया है..."

"तो ये ले डाल दे तेरा लण्ड मेरी गीली म्यानी में...।"

मैंने अपनी चूत खोल कर उसका लाल सुपाड़ा अपनी चूत में समा दिया। एक सिसकारी के साथ मैं उससे लिपट पड़ी। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि किसी गैर मर्द का लण्ड मेरी प्यासी चूत में उतर रहा है। मैंने अपनी चूत का और जोर लगाया और उसे पूरा समा लिया। उसका फ़ूला हुआ बेहद कड़क लौड़ा मेरी चूत के अन्दर-बाहर होने लगा था। मैं आहें भर भर कर अपनी चूत को दबा दबा कर लण्ड ले रही थी। मुझमें अपार वासना चढ़ी जा रही थी। इतनी कि मैं बेसुध सी हो गई। जाने कितनी देर तक मैं उससे चुदती रही। जैसे ही मेरा रस निकला, मेरी तन्द्रा टूटी। मैं झड़ रही थी, राजा भी कुछ ही देर में झड़ गया।

मेरा मन हल्का हो गया था। मैं चुदने से बहुत ही प्रफ़ुल्लित थी। कुछ ही देर में मेरी पलकें भारी होने लगी और मैं गहरी निद्रा में सो गई। अचानक रात को जैसे ही मेरी गाण्ड में लण्ड उतरा, मेरी नींद खुल गई। राजा फिर से मेरी गाण्ड से चिपका हुआ था। मैं पांव फ़ैला कर उल्टी लेट गई। वो मेरी पीठ चढ़ कर मेरी गाण्ड मारने लगा। मैं लेटी लेटी सिसकारियाँ भरती रही। उसका वीर्य निकल कर मेरी गाण्ड में भर गया। हम फिर से लेट गये। गाण्ड चुदने से मेरी चूत में फिर से जाग हो गई थी। मैंने देखा तो राजा जाग रहा था। मैंने उसे अपने ऊपर खींच लिया और मैं एक बार फिर से राजा के नीचे दब गई। उसका लण्ड मेरी चूत को मारता रहा। मेरी चूत की प्यास बुझाता रहा। फिर हम दोनों स्खलित हो गये। एक बार फिर से नींद का साम्राज्य था। जैसे ही मेरी आंख खुली सुबह के नौ बज रहे थे।

"मैं चाय मंगाता हूँ, जितने तुम फ़्रेश हो लो !"

नाश्ता करने के बाद राजा बोला,"अब चलो तुम्हें घर पहुंचा दूँ..."

पर घर किसे जाना था... यह तो सब एक सोची समझी योजना थी।

"क्या चलो चलो कर रहे हो ?... एक दौर और हो जाये !"

राजा की आंखे चमक उठी ... देरी किस बात की थी... वो लपक कर मेरे ऊपर चढ़ गया।

मेरे चूत के कपाट फिर से खुल गये थे। भचाभच चुदाई होने लगी थी। बीच में दो बार रणवीर का फोन भी आया था। चुदने के बाद मैंने रणवीर को फोन लगाया।

"क्या रहा जानू, चुदी या नहीं...?"

"अरे अभी तो वो उठा है ... अब देखो फिर से कोशिश करूंगी..."

तीन दिनों तक मैं उससे जी भर कर चुदी, चूत की सारी प्यास बुझा ली। फिर जाने का समय भी आया। राजा को अभी तक समझ नहीं आया था कि यहाँ तीन तक हम दोनों मात्र चुदाई ही करते रहे... मैं अपने घर तो गई ही नहीं।

"पर रणवीर को पता चलेगा तो...?"

"मुझे रणवीर को समझाना आता है !"

घर आते ही रणवीर मुझ पर बहुत नाराज हुआ। तीन दिनों में तुम राजा को नहीं पटा सकी।

"क्या करूँ जानू, वो तो तुम्हारा सच्चा दोस्त है ना... हाथ तक नहीं लगाया !"

"अच्छा तो वो चिकना अंकित कैसा रहेगा...?"

"यार उसे तो मैं नहीं छोड़ने वाली, चिकना भी है... उसके ऊपर ही चढ़ जाऊंगी..."

रण्वीर ने मुझे फिर प्यार से देखा और मेरे सीने को सहला दिया।

"सीऽऽऽऽऽऽ स स सीईईईई ...ऐसे मत करो ना ... फिर चुदने की इच्छा हो जाती है।"

"ओह सॉरी... जानू ... लो वो अंकित आ गया !"

अंकित को फ़ंसाना कोई कठिन काम नहीं था, पर रणवीर के सामने यह सब कैसे होगा...। उसे भी धीरे से डोरे डाल कर मैंने अपने जाल में फ़ंसा लिया। फिर दूसरा पैंतरा आजमाया। सुरक्षा के लिहाज से मैंने देखा कि अंकित का कमरा ही अच्छा था। उसके कमरे में जाकर चुद आई और रणवीर को पता भी ही नहीं चल पाया।

मुझे लगा कि जैसे मैं धीरे धीरे रण्डी बनती जा रही हूँ ... मेरे पति देव अपने दोस्तों को लेकर आ जाते थे और एक के बाद एक नये लण्ड मिलते ही जा रहे थे ... और मैं कोई ना कोई पैंतरा बदल कर चुद आती थी... है ना यह गलत बात !

पतिव्रता होना पत्नी का पहला कर्तव्य है। पर आप जानते है ना चोर तो वो ही होता है जो चोरी करता हुआ पकड़ा जाये ... मैं अभी तक तो पतिव्रता ही हूँ ... पर चुदने से पतिव्रता होने का क्या सम्बन्ध है ? यह विषय तो बिल्कुल अलग है। मैं अपने पति को सच्चे दिल से चाहती हूँ। उन्हें चाहना छोड़ दूंगी तो मेरे लिये मर्दों का प्रबन्ध कौन करेगा भला ?

मेरे जानू... मेरे दिलवर, तुम्हारे लाये हुये मर्द से ही तो मैं चुदती हूँ ...

आपकी नेहा वर्मा

थोड़ा सा प्यार-2

प्रेषिका : कामिनी सक्सेना

प्रथम भाग से आगे :

वो आह ओह्ह उफ़्फ़्फ़ करता रहा, मैं जोश भरे अन्दाज में उसकी मुठ मारती रही। मेरा यह पहला मौका था कि मैं किसी की मुठ मार रही थी। वो अब कसमसा उठा ... धीरे से झुक गया मेरे कंधों को जोर से पकड़ लिया और लण्ड ने एक भरपूर पिचकारी उछाल दी। उसके मुख से एक वासना भरी सीत्कार निकल गई। रुक रुक कर उसका वीर्य निकलता रहा।

फिर मैंने उसे हिला हिला कर सारा बचा खुचा वीर्य झटक डाला। उसने झड़ने के बाद अपना पजामा ऊपर खींच लिया। मुझे मन ही मन में बहुत खीज आई। बस माल निकल गया तो पहचानते नहीं !

हम दोनों फिर से सामान्य हो गये थे, यहां-वहां की बातें करने लग गये थे। कुछ देर बाद उसके हाथ मेरे चूतड़ों पर फ़िसलने लगे। मेरे दिल की आग बुझते बुझते फिर से भड़क उठी।

"सोना, आज की रात मेरे साथ गुजार लो ... जी भर कर प्यार करेंगे !"

"आप कब से मुझसे प्यार करने लगे... बताओ तो ?" मैंने उसे यूँ ही मजाक में पूछा।

"सच बताऊँ... मुझे तो आपसे पहले दिन से ही प्यार हो गया था।"

"मैं शादीशुदा हूँ, तब भी... एक बच्ची है फिर भी?"

"प्यार तो अन्धा होता है ना..."

आप तो अन्धे नहीं हो ना..."

"ओह, सॉरी, मुझसे गलती हो गई ... " उसका चेहरा लटक गया।

वो मुड़ा और सीढ़ियाँ उतर गया। मुझे बहुत ग्लानि हुई कि मैंने यह क्या कह दिया ? मैं भी पीछे पीछे सीढ़ियाँ उतर आई।

"हां , आप क्या कह रहे थे ... आप के साथ रात गुजारने वाली बात?"

उसकी आंखें एक बार फिर से चमक उठी।

"मैं अभी बच्ची को देख कर आती हूँ"

बालिका तो मस्ती में सो रही थी, उसे क्या देखना था ? मैं जल्दी से बाथरूम गई और नहा-धो कर चूत की शेविन्ग की। मेरी आंखों के आगे तरह तरह के दृश्य घूमने लगे। मेक-अप करके कुछ ही देर में उनके कक्ष में आ गई। वो मात्र एक चड्डी में बिस्तर पर लेटे मेरा इन्तज़ार कर रहे थे।

"लाईट बन्द कर दूँ ?"

फिर बिना पूछे मैंने लाईट बंद कर दी। मैंने मात्र पेटीकोट और ढीला सा ब्लाऊज पहन रखा था, मालूम जो था कि चुदाई करनी है। मेरे मन के लड्डू फ़ूट रहे थे। तन और मन से चुदने के लिये हर तरह से तैयार थी। मेरा दिल खुशी के मारे उछल रहा था। आंखों में और दिल में प्रेम-पिपासा नजर आने लगी थी। मैं उनके पास धीरे से लेट गई। शर्म के मारे मेरा बुरा हाल था, पर दिल से मजबूर थी। मेरा दिल अभी भी जाने क्या क्या सपने देखने लगा था। मेरी शर्म को ढकने के लिये अंधेरा मेरा साथ दे रहा था। उसने मुझे कमर से पकड़ कर अपनी ओर घुमा लिया। हाय रे ! वो कितने नजदीक था, उसकी गरम खुशबू भरी सांसे मेरे से टकरा रही थी। मेरी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी। यही हाल उसका भी था ... उसकी धड़कनें मुझे यहाँ तक सुनाई पड़ रही थी।

"सोना, आओ मुझे चूम लो, प्यार कर लो !"

"मेरे राजा, अब तो मैं आपकी हूँ ... चाहे जो कर लो !" मेरे थरथराते लब कांप उठे।

मेरे ढीले से ब्लाऊज को उसके ऊपर उठा दिया और मेरे उरोजों को थाम लिया।

मेरी तो जैसे सांसें रुक गई। अन्धेरे का राज कायम था ... अन्धेरे में मेरी हिम्मत बंधी हुई थी। उसके हाथ ने मेरे पेटिकोट के नाड़े को खींच कर ढीला कर दिया। मैंने मारे खुशी के अपनी आंखें कस कर बंद कर ली। मैं नंगी होने वाली थी। मेरी तो सुहागरात भी इतनी खूबसूरत नहीं थी, और ना ही इतनी प्यार भरी थी। धीर से अनिल ने अपने पावों से मेरा पेटीकोट खींच दिया। मैंने भी उसे उतारने में उसकी सहायता की। मेरा नंगापन अंधेरे में छुपा था ...

"आ जाओ, मेरे से लिपट जाओ ..."

कुछ मैंने, कुछ उसने बाहों के घेरे में लपेट लिया। हाय रे ! वो भी नंगा था...

जाने कब उसने अपनी चड्डी उतार दी थी। उसका मदमाता बलिष्ठ और लोहे जैसा मजबूत लिंग मेरी योनि को छू गया। मुझे एक तेज गुदगुदी सी हुई। उसके गीले होंठ मेरे चेहरे से रगड़ खा गये। मैं मस्ती में झूम उठी। उसके लिंग का दबाव मेरी योनि पर बढ़ता ही गया। मेरे मन की भावना जैसे पिंघल कर बह निकली। हाय मेरे राजा ... अब देरी किस बात की ... मेहमान को आने दे ..." मेरे चुचूक कड़े हो गये थे। उस पर उसकी अंगुलियाँ उन्हें दबा रही थी।

अपने लण्ड को दबाते हुये वो मेरे ऊपर आ गया और धीरे से उसने जोर लगा दिया। मेरी चिकनी चूत में इस तरह उतर गया जैसे मक्खन में चाकू। आह्ह्ह रे ...

मेरी मां ... मैं तो मर गई। मेरी योनि में वो मुझे एक तीव्र मिठास भरता हुआ अन्दर उतरने लगा।

"मेरे राजा ... मैं तो तेरी बांदी हो गई हूँ रे..." मैं सिसक उठी।

अनिल भी वासना के मीथे नशे में मदहोश हो गया था। लण्ड पूरा मेरी चूत में समा गया। पहले तो वो उसी का आनन्द लेता रहा, फिर धीरे से अन्दर ही अन्दर वो चूत में लण्ड रगड़ने लगा। उस रगड़ाई से मुझे तेज आनन्द आने लगा। मेरा शरीर जैसे वासना की मिठास भरी आग का गोला हो गया था। उसकी रफ़्तार बढ़ने लगी। मेरी चूत भी नीचे से उछलने लगी थी। एक साथ दोनों लयपूर्वक चल रहे थे।

चूत और लण्ड के मिलाप की थाप गूंजने लगी थी। थप थप की आवाजें और चूत की गुदगुदी मेरे होश उड़ा चुकी थी। जाने मैं नीचे दबी कब तक चुदती रही। जब होश आया तो मेरी जान जैसे निकलने वाली थी। नशे का तार टूट गया, मैं वासना के नशे में चीख सी उठी। मैं जोर से झड़ गई थी। चूत में लहरें रह रह कर उठ रही थी। मेरा पानी धीरे धीरे निकलता जा रहा था पर उसके धक्के बन्द नहीं हुये थे। मैं झड़ कर निश्चल सी लेटी थी। फिर वो भी एक धीमी सी चीख के साथ चूत मे ही झड़ने लगा। मेरी चूत को उसने लबालब भर दिया।

मुझे उसने प्यार किया और बिस्तर से उतर कर खड़ा हो गया। उसने लाईट जला दी।

मैं चौंक गई।

"अरे, ये क्या... बन्द करो ना ... मैं नंगी हूँ !"

उसने मुझे ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा,"मैं नहीं जानता था कि जितना मैंने सोचा उससे तो तुम बहुत अधिक सुन्दर हो।"

"हाय रे, मम्मी ... तुम तो बहुत बेशरम हो जी !"

"अरे ये क्या ... कुछ टपक रहा है ये तो?"

"चल हटो ... मैं साफ़ कर लूंगी !" टांगो के बीच में से टपकता हुआ वीर्य देखकर मैं शरमा गई। मैंने अपना पेटीकोट से उसे साफ़ कर लिया, फिर भी कुछ माल तो चूत में था ही। मैंने अनिल को मुस्करा कर देखा फिर जल्दी से अपने कपड़े उठा कर अपने कमरे में भाग आई। मेरे गोरे नितम्बों को देख कर एक बार फिर अनिल के मुख से आह निकल गई।

रात को ना जाने किस समय किसी ने मुझे अपने दोनों हाथों में किसी बच्चे की उठा लिया। वो कोई और नहीं अनिल ही था। मेरी नींद खुल गई। मैं उसके गले से लिपट गई। उसने मुझे उसी के कमरे में लाकर खड़ा कर दिया। हाय तौबा ! उसका लण्ड बेहद तन्ना रहा था ... उसने मेरा पेटीकोट एक बार से उतार दिया और मुझसे लिपट गया। हम दोनों बिस्तर पर एक बार फिर से यौन क्रिया के लिये तैयार हो गये थे। मुझे पता था कि इस बार मेरी गाण्ड की चुदाई होगी। मैं घोड़ी बन गई ... उसने एक खुशबूदार क्रीम मेरे गाण्ड के छेद में लगा दिया। और अपना मजबूत लोहे जैसा लौड़ा मेरी गाण्ड के छिद्र से लगा दिया। सब कुछ निशाने पर था। मैं भी इसके लिये अपने आप को तैयार कर चुकी थी। एक बार पति से गाण्ड मरवा चुकी थी, पर उसका अनुभव कुछ अच्छा नहीं था।

"सोना, तैयार हो ना?"

"हूं, उहं..."

"छेद को ढीला छोड़ो ..."

"हूं, ओह्ह्ह ..."

उसने धीरे से लण्ड छेद में घुसा दिया। सुपाड़ा अन्दर आ चुका था। लण्ड घुसते ही लग़ा कि जैसे गाण्ड फ़ट जायेगी। मेरे मुख से एक चीख सी निकल गई। तभी उसने और जोर लगाया और करीब आधा लण्ड छेद में उतार दिया। इस बार दर्द तो कम हुआ पर छेद बहुत कसा होने से जलन हुई। उसका अगला धक्का करारा था। मेरी तो आंखें उबल पड़ी ... एक भरपूर चीख निकल पड़ी।

"बस सोना जी, हो गया... अब बस चुदाई बाकी है ... प्लीज शान्त हो जाईये"

"मेरी तो फ़ट गई होगी ... देखो बहुत दर्द है..."

"कभी गाण्ड चुदाई नहीं क्या..."

"अरे गाण्ड की बात करते हो, यहाँ तो चूत भी चुदने के लिये तरस जाती है !"

उसने सब समझ कर धीरे धीरे लण्ड अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया। जलन धीरे धीरे कम होती गई। गाण्ड के छेद की चमड़ी नरम थी सो बस फ़ैल गई थी, फ़टी नहीं थी। काफ़ी देर तक वो मेरी गाण्ड चोदता रहा। उसके लण्ड की मोटाई का अहसास मुझे भली प्रकार हो रहा था। वास्तव में मुझे एक ऐसा ही मजबूत और भारी लण्ड चाहिये था जो मुझे पूर्ण रूप से सन्तुष्ट कर सके। अब मेरी गाण्ड में मुझे मजा आने लगा था, पर इतनी देर में इस यौन क्रिया के कारण मेरी चूत कसक उठी थी। अब उसमें एक लौड़ा चाहिये था। मुझे लगा कि अनिल अब झड़ने के करीब आ चुका है तो मैंने उससे विनती की,"अनिल, अब मेरी नीचे भी तर होने लगी है, उसे भी शान्त कर दो..."

वो मुस्करा उठा... और मुझे उसी पोजीशन में गाण्ड में से लण्ड निकाल कर चूत पर सेट कर दिया।

"रोज ऐसे ही गाण्ड चुदवाना, देखना कोई दर्द नहीं होगा, बल्कि मजा आयेगा।"

"बड़े अनुभवी लगते हो..." मेरी हंसी छूट गई।

"अरे नहीं ... बस किताबों में पढ़ा है ..."

मेरी प्यासी चूत ने लण्ड को पूरा ही निगल लिया। फिर भचाभच चुदाई होने लगी ... कुछ ही देर में मेरा पानी छूट गया और उसका भी वीर्य मेरी चूत में निकल गया।

अब तो मेरी पति की अनुपस्तिथि में अनिल मुझे खूब चोदता और मैं भी उसे नहीं छोड़ती थी। अब वो अपनी आधी तनख्वाह भी चुपके से मुझे दे दिया करता था। घर में खाने का सामान, मेरे और बेबी के कपड़े वगैरह भी दिलाने लगा था। अब मैं तंगी में नही, बल्कि शान से चुदवा कर रहती थी।

आज भी मैं चालीस साल की हो गई हूँ। अनिल का भी ट्रांसफ़र हो चुका था। अब तो उनकी भी फ़ेमिली है, बच्चे हैं। मेरे पति का जीप एक्सीडेंट में स्वर्गवास हो चुका था। अनिल ने उनके स्थान पर मुझे क्लर्क की नौकरी दिला दी थी। जब कभी भी वो यहाँ आते थे तो मैं उनसे जी भर कर चुदवाया करती हूँ। मेरी बेबी कल्पना का दाखिला अनिल ने जयपुर में करवा दिया था।

कामिनी सक्सेना

थोड़ा सा प्यार-1

प्रेषिका : कामिनी सक्सेना

जमशेदपुर की स्वर्णलता लिखती है कि अन्तर्वासना की कहानियाँ बहुत रोचक होती हैं। पढ़ने के बाद दिल में कुछ कुछ होने लगता है। आज वो 40 वर्ष की अधेड़ महिला है और अपने पति की मृत्यु के उपरान्त उसी कार्यालय में कार्य करती है। उसकी यह कहानी उस समय की है जब वह 26 वर्ष की थी। उनके पास उस समय एक 9 माह की लड़की भी थी। उसके पति सरकारी दफ़्तर में ड्राईवर थे, जो अक्सर अपने बड़े साहब के साथ अधिकतर यात्रा पर ही रहते थे।

स्वर्णलता के शब्दों में :

हम पति पत्नी एक कस्बे में बड़े से मकान में किराये पर रहते थे। हम उस बड़े मकान की रखवाली भी करते थे। हमारी माली हालत भी अच्छी नहीं थी। किसी तरह से दिन गुजर रहे थे। मेरे पति राधेश्याम बहुत कम बोलने वाले व्यक्ति थे। सेक्स में उनकी अधिक रुचि नहीं थी। उन्हीं दिनों ऑफ़िस में एक नये अधिकारी का पदस्थापन हुआ था। वे बड़े साहब के सहायक थे। उनका नाम अनिल था। नई भर्ती से आये थे, बहुत चुस्त, फ़ुर्तीले, मधुर स्वभाव के थे वो। उस समय लम्बे बालो का फ़ेशन था, उनके हल्के उड़ते हुये रेशमी बाल मुझे बहुत अच्छे लगते थे। अनिल को मेरे पति ने अपने बड़े मकान में एक हिस्सा दे दिया था।

अनिल बहुत हंसमुख स्वभाव के थे। मुझसे वो बहुत इज्जत से पेश आते थे। एक मन की बात कहूँ ! आप पाठकगण शायद हंसेंगे ? हम जैसी महिलाओं में अधिकतर यह दिली चाह होती है कि हमारा पति भी एक ऑफ़ीसर जैसा हो, उसका रुतबा हो ! और उसी स्वप्न में हम उसी स्टेण्डर्ड से रहने भी लग जाती हैं, अच्छे कपड़े पहनना, मंहगी वस्तुएँ खरीदना, और हां फिर उसे सभी को बताना। ये सभी कमियां मुझ में भी थी।

अनिल को हमारे साथ रहते हुये तीन चार माह बीत चुके थे। मैं उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं होने देती थी, उन्हें खाना, चाय नाश्ता वगैरह उनकी पसन्द का ही देती थी, बदले में वो हमें जरूरत से अधिक पैसा देते थे। मैं अनिल के साथ बहुत घुलमिल गई थी। वो मेरे पति से अधिक बात नहीं करते थे, क्योकि शायद वो उनके भी ड्राईवर थे। घटना की यूँ शुरूआत हुई ...

एक शाम को हमारा एक पुरानी फ़िल्म देखने का कार्यक्रम बना। मुझे याद है वो दिलीप कुमार की पुरानी फिल्म देवदास थी। किसी कारणवश मेरे पति को बड़े साहब के साथ यात्रा पर जाना पड़ा। मैं मन मसोस कर रह गई। ऐसे में अनिल ने कहा कि वो मुझे फ़िल्म दिखा लायेगा। शाम को 5 बजे के शो में हम दोनों चले गये। मैनेजर ने अनिल को स्पेशल क्लास में बैठाया... मुझे भी बड़ा गर्व सा हुआ कि मैं किसी बड़े अधिकारी के साथ फ़िल्म देखने आई हूँ। मैनेजर ने अपने नौकर से हमारी सेवा करने का आदेश दे दिया था। वो बीच में आ कर हमे कोल्ड ड्रिंक आदि दे जाता था। फ़िल्म चल रही थी। मुझे अचानक अहसास हुआ कि अनिल ने जैसे मुझे छुआ था।

मुझे लगा कि यह सम्भव ही नहीं है। तभी दुबारा उसका हाथ मेरे हाथों से धीरे से टकराया। मुझे झुरझुरी सी हुई। मैंने तिरछी आंखो से उन्हें देखा। वो भी मुझे चुपके चुपके देख रहे थे। मुझे लगा कि शायद वे मेरे अकेलेपन का फ़ायदा उठा रहे हैं। मर्दों की एक फ़ितरत यह भी होती है कि एक बार कोशिश तो कर लो, क्या पता लड़की पट जाये ... नहीं तो कुछ समय के लिये नाराज हो जायेगी और क्या ?

नहीं... नहीं ... ऐसा नहीं हो सकता ... मेरे जैसी छोटे तबके वाली लड़की के साथ तो कभी नहीं ...। फिर ऐसा क्यूँ ? क्या मेरे रूप लावण्य के कारण, या मेरी सेक्स अपील के कारण। फिर वो कुंवारा भी तो था ... शायद जवानी के जोश में ... । मुझे सावधान रहना था कि कहीं मुझसे कोई भूल ना हो जाये। पर फिर एक बार और उसकी अंगुलियों का स्पर्श मेरे हथेली पर हुआ ... मैं तो जैसे जड़ सी हो गई ...

मुझसे अपना हाथ हिलाने की शक्ति भी जैसे जवाब दे गई। मुझे यह मालूम हो गया था कि अनिल ये सब जानबूझ कर कर रहा है। मेरे चेहरे पर पसीना आ गया था।

वो मुझसे क्या चाहता है ... क्या मालूम ? उसने जब मेरा विरोध नहीं देखा तो उसकी हिम्मत बढ़ गई। उसकी अंगुलियां मेरी हथेली पर दबाव डालने लगी। मुझे जैसे लकवा मार गया था। मैं चाह कर भी अपना हाथ नहीं खींच पा रही थी।

अचानक उसका हाथ मेरे हाथों पर आकर ठहर गया और मेरे अंगुलियों को पकड़ने लगा।

मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा... मेरी जिन्दगी में किसी पहले पराये मर्द का स्पर्श मेरे मन में बेचैनी पैदा कर रहा था। अब उसका हाथ मेरे हाथों को दबाने और सहलाने में लगा था। मैंने हिम्मत बांधी और अपना हाथ खींच लिया। मैं अपने पल्लू से माथे का पसीना पोंछने लगी। उसका हाथ एक बार फिर मेरी जांघों से स्पर्श करने लगा। मेरे तन में जैसे बिजलियाँ तड़क उठी। मैं कांप सी गई।

शायद मेरी ये कंपकंपी उसने भी महसूस की। मुझे सामान्य महसूस कराने के लिये वो मेरे से बातें करने लगा। उसका हाथ ज्योंही मेरे जांघो को सहलाने लगा, मुझे घबराहट होने लगी थी। तभी मेरी बच्ची की नींद खुल गई। मैंने उसे जल्दी से अपनी गोदी में लिया। उधर अनिल भी बेचैन सा होने लगा। कुछ ही देर में बच्ची फिर से सो गई। पर जाने क्यूँ अब मेरा दिल भी बेचैन सा होने लगा था। मुझे अनिल के हाथों मे जादू सा लगा। मैंने सोच लिया था कि इस बार उसका हाथ मैं थाम लूंगी ... और उसे भी अपनी दिलचस्पी दिखाऊंगी। उसके बढ़ते हाथों का इस बार मैंने स्वागत किया और उसकी अंगुलियां मेरे हाथों में खेलते समय मैंने उन्हें थाम लिया। मैंने अपनी मौन स्वीकृति दे दी थी। उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी सीट पर ले लिया था और उसे सहला रहा था। एक बार तो उसने चूम भी लिया था।

मैंने धीरे से उसके कंधे पर अपना सर रख दिया। उसने अपना एक हाथ मेरे गले से लिपटा कर अपनी ओर मुझे खींच लिया।

आह... कितना प्यारा माहौल था ... मुझे लगा कि जैसे मैं उसे प्यार करने लगी हूँ। उसके होंठों ने मेरे गाल चूम लिये। मैंने अपनी बड़ी बड़ी आंखें खोल कर उसे आसक्ति से निहारा। उसका चेहरा मेरे होंठों की तरफ़ बढ़ने लगा। मेरे कोमल पत्तियों जैसे अधर कंपकंपा उठे ... थरथरा उठे... और एक दूसरे से चिपक गये।

जाने कितनी देर तक हम ऐसे ही एक दूसरे को चूमते रहे ... फिर एक दूसरे को प्यार से निहारते हुये अलग हो गये। सारी फ़िल्म में यही सब कुछ चलता रहा।

रात को नौ बजे फ़िल्म समाप्त हुई तो हम घर लौट आये। रास्ते भर मेरी नजरें शर्म से झुकी रही। अनिल तो बहुत खुश लग रहा था पर फिर भी चुप था। रास्ते भर कोई बात नहीं हुई।

रात का भोजन करने के बाद हम दोनों छत पर आ गये थे। मैं अपनी साड़ी उतार कर मात्र पेटीकोट में थी, ब्रा भी हटा दी थी। बच्ची सो चुकी थी। वो चांदनी रात में सफ़ेद पजामे में बड़ा ही मोहक लग रहा था। काफ़ी देर तक तो हम चुपचाप खड़े रहे ...

उसी ने चुप्पी तोड़ी,"फ़िल्म कैसी लगी ...?"

"जी फ़िल्म में तो जी ही नहीं लगा ... मेरा ध्यान उधर नहीं था।" मैंने अपनी सच्चाई बयान कर दी थी।

"सच कहती हो, मन तो मेरा भी कही ओर था..." वो हंस कर बोला।

"हॉल में कोई देख लेता तो..."

"कौन देखता भला, इतनी पुरानी फ़िल्म कोई नहीं देखता है ... एक बात कहूँ?"

मैं एकदम घबरा सी गई। मुझे मालूम था कि वो कहने वाला है।

"जी... जी... कहिये"

"मुझे नहीं कहना चाहिये लेकिन दिल से मजबूर हूँ... आप मुझे ... ओह कैसे कहूँ !"

मैं शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी। मेरा दिल जैसे उछल कर गले में आ गया था।

"जी ... क्या कहना है?"

मैंने अपना मुख पीछे कर लिया। वो मेरे पीछे आ गये और मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।

"आ...आ...आप बहुत अच्छी हैं !" उसकी आवाज में कम्पन था।

"जी ... जी..." मैं हकला सी गई।

"सोना, मैं आपसे ... उफ़्फ़ कैसे कहूं !"

मैंने पलट कर अनिल को प्रेम से देखा और कहा,"जी ... आप क्या कहना चाहते है... कहिये ना ... मैं इन्तज़ार कर रही हूँ।"

"बस एक बार जैसे हॉल में किया था वैसे ..."

"क्या ... कहिये ना..."

उसने असंमजस में मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया। मैं थोड़ा सा कुलबुलाई और उसे दूर हटा दिया।

"ये क्या कर रहे है आप..." मैं शर्म से फिर से पानी पानी होने लगी थी। मेरा मन उनकी बाहों में समाने को करने लगा था। मैंने अपना दिल मजबूत कर लिया कि अगली बार उसने कुछ किया तो मैं स्वयं ही उससे लिपट जाऊंगी।

"वही जो हॉल में किया था... बस एक बार !" उसने फिर से मुझे अपनी बाहों में खींच लिया। दिल तो पागल है ना... मचल उठा। कैसे रोकूँ अपने आप को... मैं अपने दिल से बेबस हो गई। मैं उसकी बाहों में झूल गई। उसका मुख मेरे चेहरे के करीब आ गया। मैंने अपनी आंखें बन्द कर ली। दोनों के तड़पते हुये अधर मिल गये। मेरा शरीर विचित्र सी आग में जल उठा। उसके हाथ मेरी पीठ पर गड़ गये और यहां-वहां दबाने लगे। मेरे हाथ भी उसकी बनियान को जैसे हटा देना चाहते थे।

उसका बलिष्ठ शरीर दबाने में मुझे बहुत आनन्द आ रहा था। तभी... हाय रे ... ये क्या ... उसका कड़क लण्ड मेरी योनि द्वार के समीप टकराने लगा। मुझे नीचे एक बहुत ही दिल को भाने वाली गुदगुदी सी हुई। वो मेरी चूत पर गड़ता ही गया...

मुझे लगा ... कही ये मेरे शरीर में प्रवेश ना जाये।

"अनिल ... बस करो..."

"एक बात कहूं ... मानोगी?"

"एक क्या, सौ बात कहो ... सब मानूंगी !" मैंने शर्माते हुये कहा।

"हॉल में मैं कुछ करना चाहता था ... पर नहीं कर पाया ... प्लीज करने दो !"

"क्या ... बोलो ना !"

"बस आप चुप हो जायें ... मुझे करने दो।"

उसने मुझे दीवार से सटा दिया और धीरे से मेरे उन्नत उरोजों पर अपना हाथ रख दिया। मेरा जिस्म कांप गया। उसके हाथ मेरे ब्लाउज के ऊपर से ही चूचियों को दबाने लगे। बटन एक के बाद एक खुलते गये। उसने हाथ उरोजों पर गोल गोल घूमते रहे, सहलाते रहे, दबाते रहे ... मेरी चूत में से ये सब बहुत तेजी से असर कर रहा था। उसमें से प्रेम रस की बूंदें चू पड़ी थी। चूत में गुदगुदी भरी मिठास तेज होने लगी थी। मैं निश्चल सी बुत बनी हुई खड़ी रही। उसका पजामा बाहर की ओर तम्बू सा तन गया। मैं उससे लिपट पड़ी। मेरा हाथ अनजाने में ही उसके लण्ड की ओर बढ़ गया। आह ... मेरे ईश्वर ... कैसा लोहे जैसा कड़ा, जाने घुसने पर क्या कर डालेगा ? लण्ड दबते ही अनिल के मुख से आह निकल पड़ी।

"सोना, कैसा लग रहा है ना ... मुझे तो बहुत आनन्द आ रहा है।"

"हाय रे ... तुम कितने अच्छे हो अनिल ... "

"सोना, बस कुछ मत कहो ... मुझे तो जैसे स्वर्ग मिल गया है।"

उसने मेरे चूतड़ों पर हाथ फ़िराना चालू कर दिया, मेरे पीछे के उभारों को दबाने लगा, मेरे चूतड़ों के बीच की दरार में अपनी अंगुली घुसाने लगा। उसके चूतड़ों को इस तरह से दबाने से मुझे बहुत आनन्द आने लगा। मेरे चूतड़ को वो हाथ से पकड़ता और ऊपर नीचे हिला डालता था। मुझे जिंदगी में मेरे पति ने कभी ऐसा कभी नहीं किया था। वो अपना लण्ड भी मेरे गाण्ड में गड़ा देता था। उसके लण्ड के दबाव से मेरी खूत में खुजली उठने लग जाती थी।

"सोना, देखो रात का समां है ... कोई देखने, सुनने वाला नहीं है ... प्लीज एक बार मेरा लण्ड थाम लो ... प्लीज, मुझे बहुत आनन्द आयेगा !"

उसने अलग होते हुये अपने पजामे में से अपना लण्ड बाहर निकाल लिया।

हाय रे ... ये क्या ... इतना सुन्दर ... मैं उससे फिर लिपट गई और हाथ नीचे बढ़ा कर उसे थाम लिया। उफ़्फ़्फ़ ! कितना गरम, कितना नरम और ये सुपाड़ा !!! मेरी जान ले लेगा ... मैंने छत की पेरापिट की दीवार पर उसे टिका कर लण्ड को हाथ में लेकर उसकी चमड़ी डण्डे के ऊपर उघाड़ दी। चांदनी रात में उसका सुपाड़ा चमक उठा।

मैंने उसे अपनी मुठ में भर लिया और धीरे धीरे उसका हस्त मैथुन करने लगी। वो मस्ती में तड़प उठा। उसकी दोनों हाथों की मुठ्ठियां भिंच गई। मैं उसके सामने खड़ी बड़े जोश से लण्ड मल रही थी। उसकी तड़प मेरे दिल को छू रही थी। उसके चूतड़ भी मुठ मारने से हिल हिल कर मेरा साथ दे रहे थे।

"सोना ... मार देगी रे तू तो आज...।"

"ये तो हम हॉल में नहीं कर सकते थे ना ... वही तो कर रही हूँ... कैसा मजा आ रहा है ... है ना?" मेरे मुख से उसी की भाषा निकल पड़ी।

शेष कहानी दूसरे भाग में !